डाॅ. एन. सिन्डी ट्रिम
प्रभावी प्रार्थना और आत्मिक युद्ध की रणनीतियाॅं एवं तौर तरीके !
भजन संहिता 144: 1-15 में एक कुशल योद्धा की, जिसका नाम दाऊद था, प्रार्थना दर्ज की गई है। उसके बालक गड़रिये के जीवन से लेकर इस्राएल पर राज्य करने के सम्पूर्ण समयों में, परमेष्वर ने उसे रणनीतिक प्रार्थना और आत्मिक युद्ध की कला, विज्ञान और तकनिकी युक्तियों से भरपूर किया।
उसने इसकी प्रवीणता और विशेषज्ञता को उस समय प्राप्त किया जब परमेष्वर ने अपने प्रभुत्व में उसे नाना प्रकार के युद्धों में रखा, जिनमें भालू और सिहों के हमलों से लेकर गोलियत के साथ युद्ध शामिल हैं, और वह युद्ध भी जो उसने अपने निज पुत्र अशालोम के साथ लड़ा, जिसके बगावती विद्रोह के कारण उसे राज्य की हानि भी उठानी पड़ी। इस भजन में दाऊद हमें यह बताना चाहता है कि वह युद्ध में महाप्रतापी यहोवा गिब्बोर हैं, जिन्होंने उसे युद्ध की रणनीतियां और तौर तरीके सिखाए हैं और जो उन्हें सफलता की सामर्थ देते हैं। वह अपने परमेष्वर के आदर में, जो उसकी सामथ्र्य हैं, आवाज उठाता है। वह स्तुति करके कहता है: ‘‘धन्य है यहोवा जो मेरी चट्ठान है, वह मेरे हाथों को लड़ने और युद्ध करने के लिये तैय्यार करता है। वह मेरे लिये करूणा निधान, और गढ़, ऊंचा स्थान और छुड़ाने वाला है, वह मेरी ढाल और शारणस्थान है, जो मेरी प्रजा को मेरे वश में कर देता है।।’’ (भजनसंहिता 144ः1-2)
दाऊद के जीवन के अनुभवों से मैंने सीखा है कि एक कुशल योद्धा के प्रशिक्षण का केवल एक ही मार्ग है कि उसे युद्ध के मैदान में रख दिया जाए। केवल उसी समय जब नरक आप पर टूट पड़ता है तब आप दुखों के भट्टे में डाल दिये जाए और जब आद मानो नरक जाते हैं और शैतानी शक्तियाॅं आपको चारों ओर से घेर लेती हैं, आप रणनीतिक प्रार्थना की कला में और आत्मिक युद्ध में प्रशक्षित हो जाते हैं। अभ्यास हमें सिद्ध नहीं बनाता। सिद्ध अभ्यास ही, हमें सिद्ध बनाता है। आप ‘‘युद्ध के खेलों’’ के द्वारा कभी भी उस स्तर का आवश्यक प्रशिक्षण नहीं प्राप्त कर सकते जिससे प्रभावी प्रार्थना-योद्धा बनाया जाता है। एक यथार्थ शत्रु का एक यथार्थ युद्ध के मैदान में आपको शत्रु का सामना करना होगा। तब परमेष्वर आपको यथार्थ युद्ध में रखकर प्रशिक्षित करते हैं, आप सच्चा अनुभव प्राप्त करते हैं। केवल बाइबिल पढ़ना, कार्यशालाओं और सभाओं में भाग लेना, आपको कभी भी प्रभावी योद्धा नही बना सकते। नीतिवचनों में कहा गया है कि ‘‘अनुभव के बिना ज्ञान व्यर्थ है’’।
क्रमानुसार आठ पुस्तकों में यह पहली पुस्तक है। प्रत्येक पुस्तक धर्मशास्त्र पर आधारित है। मैंने धर्मशास्त्र के संदर्भ को लिखा है जिस पर प्रत्येक भाग निर्मित किया गया है। इस प्रार्थना का प्रतिदिन उपयोग में लाइये। इस प्रार्थना को ऊंचे स्वर से कीजिये। उसे कन्ठस्थ कीजिये। धर्मशास्त्र के संदर्भो को अपने दैनिक मनन के समय उपयोग में लाईये। उनका अध्ययन कीजिये। ये आपको विश्वाश की लड़ाई लड़ने में सामथ्र्य प्रदान करेंगे। इस युद्ध की प्रार्थना को, इस संग्रह की दूसरी पुस्तकों के साथ जोड़ते जाएं। अच्छा होगा कि आप परिस्थतियों और हालातों पर नजर रखें। स्मरण रखिये कि जब आप युद्ध में हैं या किसी असम्भव परिस्थति में आ जाते हैं, और जब कोई बचाने वाला कोई नही होता तब ही एक सच्चा योद्धा पैदा होता है। हार मान लेने, हथियार डाल देने, या शत्रु की रणनीतियों का शिकार बन जाने के बदले अपने इन संघर्शों के समयों को, परखे जाने और परीक्षाओं को, रणनीतिक प्रार्थना और आत्मिक युद्ध के प्रशिक्षण के ईष्वरीय अवसर समझिये।
निश्चय जानिये कि यह समय वास्तविक प्रमाणिक प्रशिक्षण स्थान है, जिन्हें परमेष्वर ने, आपको अपने सच्चे राज्य में लाने के लिये चुना है। जैसा दाऊद के साथ हुआ, उसी प्रकार यह आपके लिये भी, ऐसे स्थल हों जो अधिकतम क्षमता को पहिचानें और अपने उद्वेष्यों की पूर्ति के लिये अंतिम निर्णायक बन सके।
बाइबिल कहती है कि विष्वासी को, ‘‘निरन्तर प्रार्थना करना और हियाव नहीं छोड़ना चाहिये..... कि शैतान का हम पर दांव न चले, क्योंकि हम उसकी युक्तियों से अनजान नहीं’’ (लूका 18ः1; 2कुरि. 2ः11)। शैतान हमेशा संतो को मार डालने की योजना बनाते रहता है। यदि आप प्रार्थना में आत्मिक सफलता का और प्रगति का अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको पौलूस द्वारा तीमुथियुस को दिये गए प्रेरितीय निर्दोशो पर ध्यान देना चाहिये। आपको अपने उद्देष्य और भाग्य के लिये युद्ध प्रारंभ कर देना चाहिये। उसने (1 तीमुथियुस 1ः18-19) में तीमुथियुस को आदेश दिया, ‘‘उन भविश्यद्वाणियों के अनुसार जो पहिले तेरे विशय में की गई थी, मैने यह आज्ञा सौंपता हूँ’’। शत्रु चाहता है कि आपके जीवन में, सम्बन्धों का, मसीही सेवकाई रूपी जहाज डूब जाए। परन्तु आपकों जानना चाहिये कि आप प्रत्येक भविश्यद्वाणी को जो आपके जीवन के लिये दी गई है, प्रभावी ढंग से कैसे उपयोग में लाते हैं ताकि शैतान के हमलों का सामना कर सकें। जब मैं भविश्यद्वाणियों के विशय में कर रहा हूँ तो मैं परमेष्वर के वचन के विशय में कह रहा हूँ, जिसे (इफिसियों 6ः17) में ‘‘आत्मा की तलवार’’ नाम दिया गया है। बाइबिल भविश्यद्वाणियों और प्रतिज्ञाओं का बड़ा संग्रह है, जिन्हें आप शत्रु के विरूध्द, हथियारों के रूप में काम में ला सकते हैं। समस्याओं के लिये प्रार्थना करने के बदले, परमेष्वर की प्रतिज्ञा ओं को प्रार्थना में उपयोग कीजिये।
उत्पत्ति के पहले अध्याय के अनुसार जब शत्रु ने जगत को बेडौल बनाकर बिगाड़ दिया, तब परमेष्वर ने वचनों (अपने मुख की आत्मा) का उपयोग किया ताकि जगत फिरसे उसकी यथोचित स्थिति और लाईन में आ जाए। जिस प्रकार उन्होंने आरम्भ में जगत का नमूना और योजना बनाया क्योंकि हम परमेष्वर के स्वरूप और समानता में सिरजे गए हैं, हमें भी वही सामथ्र्य प्राप्त है (कृपया उत्पत्ति 1ः26 देखिये)।
ये कहे गए वचन की सामर्थ है जो आपको जीवन या मृत्यु देती है। तथा आषिश अथवा षाप लाती है (नीतिवचन 18ः21)। आपको अपने जीवन , घर, मसीही सेवकाई समाज और पूरे जगत में षत्रु के कार्यों को नाष करने के लिये अभिशेक किये हुए वचनों को प्रभावी ढंग से उपयोग में लाना चाहिये। अपने सभी व्यर्थ, प्रभावहीन वचनों को अभिशेक किये हुए वचनों से बदल लीजिये। परमेष्वर 2थिस्सलूनिकियों 2ः8 में कहते हैं, कि षैतान उनके मुख के वचन (आत्मा की फंूक) से मार डाला जाएगा। और आगमन के तेज अभिशेक (The anointing K.J.V) से उसे नाश कर देगा। जैसे ही आप अभिशेक किये हुए वचनों की प्रार्थना करेंगे जुआ तोड़ डाला जाएगा, और बोझ हटा दिये जाएंगे और आपके जीवन तथा आपके प्रियजनों के जीवनों के जीवनों में एक बड़ी क्रांन्ति आ जाएगी, आपकी मसीही सेवकाई में नई शक्ति का संचार होगा और शत्रु भयभीत हो जाएगा। बाइबिल अय्यूब 22ः27-28 में कहती है, ‘‘तू उससे प्रार्थना करेगा, और वह तेरी सुनेगा’’। ‘‘शब्द बनाने’’ का अर्थ है, रचना करना, निर्माण करना, रूपांकन करना। आगे कही गई सभी घोशणाएं धर्मशास्त्र के आधार पर ही रची गई, निर्मित की गई और उनका रूपांकन हुआ। प्रत्येक घोशणा के अन्त में, धर्मशास्त्र के संदर्भ लिखे गए हैं, और पुस्तक के अन्त में एक शाब्दावली दी गई है ताकि इन्हें और भी अधिक अच्छी जानकारी के साथ समझा जा सकें। जब आप प्रार्थना करते हैं निश्चयता के साथ प्रार्थना कीजिये कि, ‘‘अधोलोक के फाटक प्रबल न होने पाएं’’। (मत्ती 16ः18-19)
इन अंतिम दिनों में परमेष्वर व्यवास्थित रीति से प्रार्थना-योद्धाओं को लिये चल रहे हैं जिन्हें अन्धकार की शक्तियों पर न्यायोचित अधिकार प्राप्त करने के लिये अभिशेक किया गया है ताकि घराने, जातियां, सरकारें, मंत्रालय, नगरनिगम, क्षेत्र, राज्य और देश, ईष्वरीय क्रम में आ जाएं। तथा प्रत्येक व्यक्तिगत क्षमता और उद्देष्य को उच्चतम शिखर तक ले जा सकें। इसे बहुत प्रभावशाली ढंग से किया जाना है, शत्रु शैतान की योजनाओं और उद्देष्यों को परमेष्वर के वचन के प्रभावी प्रयोग द्वारा लागू कर देना है। पवित्र आत्मा की भूमिका, एक सैन्य शिक्षक की कलाॅ सिखाने वाले शिक्षक की तरह है, जिसकी जिम्मेवारी है कि वह आपको रणनीतिक प्रार्थना और आत्मिक युद्ध केे लिये प्रशिक्षित करें। वह आपको दुश्टत्माओं के लोक पर हमले करना भी सिखाएगा ताकि आप शैतानी दुश्टत्माओं के चलते फिरते लक्ष्यों पर भी फुरती के साथ अचूक निशाने मार सकें। दाऊद की तरह वह शैतानिक भालू, सिंह और दानवों पर जय प्राप्त करना सिखायेगा। मेरी प्रार्थना है कि जब आप इस पुस्तिका में दिये गए, सिद्धातों और रणनीतियों को सीखते हैं, परमेष्वर आपको एक अन्त के दिनों का आत्मिक योद्धा और दुश्टात्माओं को धराषाई करने वाला बनाकर खड़ा करे।
आपके प्रार्थना के समय में प्रभु आप पर पहरूए की आत्मा भेज सकते हैं, और आप या तो परमेष्वर की इच्छा के भाग को प्राप्त कर सकते हैं। या उससे जो आपकी प्रकृति के अनुसार शैतानी है (यहेजकेल 3ः17) ‘‘यदि वह ईष्वरीय है तो प्राप्त की गई बात के अनुसार उस पर यह कहते हुए जय पाईये, ‘‘आपका राज्य आए, आपकी इच्छा पूूरी हो (मत्ती 6ः10)। यदि गतिविधि शैतानी या पैशाचिक मूल से है तब युद्ध के नियमों का उपयोग करते हुए उसके विरूद्व प्रार्थना कीजिये। बाइबिल यह दर्षाती है। कि गिनती के अंको में सामर्थ है। वह स्पश्ट कहती है कि यदि दो जन किसी बात के लिये जिसे वे मांगे, एक मन के हों तो ‘‘वह उनके लिये हो जाएगी’’ और यह भी कि ‘‘हजार का पीछा एक मनुश्य करता (सकता) है और उनके दस हजार को दो मनुश्य भगा देते (सकते) हैं? (मत्ती 18ः19; व्यवस्था विवरण 32ः30)। एक दूसरे के साथ मिलकर प्रार्थना करना आपकी सामथ्र्य कि धरातल को बढ़ा देता है। एक कारण है कि क्यों हम प्रार्थना करने की सम्भावित सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं, जब दूसरों के साथ झुण्ड में प्रार्थना करते हैं, क्योंकि झुण्ड में जो व्यक्ति हैं। वे अलग-अलग स्तर की आत्मिक परिपक्वता के हैं और अपने अपने भारों को नहीं उठा पाते, या हम भिन्न भिन्न प्रकार की प्रार्थना रणनितीयां, तरीके और शब्द उपयोग में ला रहे हैं। मैनें कई बार ऐसा भी अनुभव किया है कि सब जन मिलकर प्रार्थना करने तो आए है। किंतु उनका प्रार्थना विशय, झुण्ड के प्रार्थना-विशय से अलग है। शैतान जो, जानता है कि परमेष्वर एक मन एक चित्त से की गई प्रार्थनाओं की सराहाना करते और उन्हें आशीशित करते हैं (भजन 133ः1-3)
तब वह यही कोशिश करेगा, कि विष्वासियों की एकता की आत्मा को नश्ट कर दे, ताकि यद्यपि हम एक स्थान पर जमा हुए हैं हम एक मन के, एक मनसा और एक ही तरह की बात करने वाले नही हो पाएं। यह सच्ची एकता नहीं है। मैं पूरी शक्ति के साथ यह परामर्श देती हूँ। जब भी कलीसिया प्रार्थना के लिये सभा बुलाती है, तब पूरे प्रार्थना झुण्ड को एक मन व एक चित्त से प्रार्थना करना चाहिये, तथा एक ही शैली उपयोग में लाना चाहिये और उन्हें एक ही प्रार्थना विशय पर सहमत होना चाहिये। यह पुस्तक इन्ही बातों को समायोजित करने के लिये लिखी गई है ताकि जवान मसीही भी उसी तरह प्रभावी ढंग और दृढ़ता के साथ प्रार्थना कर सकें, जिस प्रकार परिपक्व प्राचीन भक्त प्रार्थना करते हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य है कि वह उस स्तर की एकता को लादे कि सब यीशु के नाम में ‘‘एक मन, एक चित से सहमत’’ हो जाएं।
जब कलीािसया के विशय में किसी विशेश बात के लिये प्रार्थना की जाती है, सेवकाई या संगठनात्मक, तब यह महत्वपूर्ण है कि कोई भी या सभी आत्मिक गतिविधियांे को ब्योरेवार लिखा जाए और उसे मुख्य प्रार्थना-योद्वा को, प्रार्थना झुण्ड को और आपके पास्टर को प्रस्तुत किया जाए ताकि आपकी अन्तः दृश्टि सही रीति से जांची जाए और आपको प्रार्थना में पूरी सहायता और शक्ति प्राप्त हो सके।
इस प्रार्थना का उद्देष्य है कि आपकी आकाशीय (स्वर्गीय) स्थानों में प्रभावी युद्व में मदद हो ताकि वहां नए सामथ्र्य, अधिकार क्षेत्र प्राप्त हों और परमेष्वर का राज्य नये लोकों में, क्षेत्रों और लौकिक राज्यों में स्थापित हो और आत्माओं के लोक में बचाव की मुद्रा में बने रहने से निकलकर हम अब हमला करने की स्थिति में आ जाए।(दानिय्येल 9ः 1-12; इफिसियों 6ः 11-18; प्रका.वाक्य 12ः4, 7-9)
मैंने यह पाया है कि यद्यपि मै भूतकाल में बड़ी गंभीरता के साथ अैर वचनानुसार प्रार्थना कर रहा था / रही थी परंतु तौभी ऐसा प्रतीत होता है कि मानों वे सब प्रार्थनाएं शत्रु द्वारा या तो नश्ट की गईं या उनका विरोध किया गया। और जब मैंने परमेष्वर से प्रार्थना करके पूछा कि ऐसा क्यों हुआ? तब उन्होंने बताया कि यद्यपि मैं गिड़गिड़ाकर प्रार्थना कर रहा था / कर रही थी परंतु फिर भी वह प्रभावी नहीं थी, क्योंकि मैं गलत ढंग से प्रार्थना कर रहा था/ रही थी। मैं एक गलत स्थान व परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना कर रहा थी। शैतान को मेरे युद्व में बढ़त मिल गई, क्योंकि मैंने अज्ञानता वश ‘‘सांसारिकता निहित प्रार्थनाएं’’ की। प्रभु ने बताया कि मुझे उसी स्थान पर रहकर युद्ध करना है जहां पर युद्ध छिड़ा हुआ है अर्थात आकाशीय स्वर्गीय स्थानों में। उन्होंने मुझे यह भी पक्की तौर पर बताए कि मैं भी मसीह यीशु में स्वर्गीय स्थानो में सारी प्रधानताओं और अधिकारीयों के ऊपर बैठाई गई हूँ (इफिसीयों 2ः20-22; 3ः6)। तब मुझे मालूम हुआ कि शैतानी शक्तियाँ मेरे ऊपर नहीं हैं जिससे वे अपनी शैतानी गतिविधियों द्वारा मुझ पर प्रभाव डाल सकें। परंतु इसके विपरीत, मै उनके ऊपर हूँ!! इन वचनों के प्रगटिकरण से सामर्थ पाकर मैं शैतान के लिये भयावाह हो गई, अब मैं अधिकार और आत्मविष्वास के साथ प्रार्थना करने लगी और जानने लगी कि जो कुछ मैं चाहती हॅू, जब मैंने प्रार्थना की तो मुझे अनुकूल परिणाम प्राप्त होंगे।(मरकुस 11ः23-24)
जब आप प्रार्थना करना आरम्भ करते हैं, तब अपने कानूनी वैधानिक अधिकारों और आत्मिक अधिकारों का उपयोग करना स्मरण रखिये। परमेष्वर ने शत्रुओं को आपके पैरों के तलेे कर दिया और आपको अधिकार दिया है, कि सांपो और बिच्छुओं को रौंदें और शत्रु की सारी शक्तियों पर भी अधिकार दिया है और कोई भी वस्तु किसी भी प्रकार से आपको हानि नही पहूँचा सकती। ‘‘तौभी इससे आनन्दित मत हो कि आत्माएं (spirts) तुम्हारे वश में हैं (लूका 10ः20)। जब आप इन रणनीतियों और तरीकों को उपयोग में लाते है। तब शत्रु पर जरा भी दया मत कीजिये। 2 कुरिन्थयों 2ः14 के अनुसार परमेष्वर आपको जय दिलाएंगे। स्मरण रखिये जब आप प्रार्थना कर रहे हैं, आप लहु और मांस से युद्ध नहीं कर रहें हैं परन्तु आत्मिक शक्तियों से जो मनुश्यों को उपयोग में लाते है ताकि वे अपने अभिप्राय को पृथ्वीं पर पूरा कर सकें। यद्यपि आपके हथियार शारीरिक नहीं परन्तु ईष्वरीय सामर्थ से परिपूर्ण हैं। तब कोई भी हथियार जो आपके विरोध में बनाया जाएगा, कभी सफल नहीं होगा, और प्रत्येक जीभ जो न्याय में आपका विरोध करेगी, आप उसे दोशी ठहरा सकेंगे। ‘‘प्रभु यहोवा के दासों का यही भाग होगा और वे मेरे ही कारण धर्मी ठहरेंगे, यहोवा की यही वाणी है। (यशायाह 54ः17)
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